Ahmed Faraz Ghazal – उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया

उसने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
हिज्र की रात बाम पर माहे-तमाम रख दिया

आमद-ए-दोस्त की नवीद कू-ए-वफ़ा में आम थी
मैनें भी इक चिराग़-सा दिल सर-ए-शाम रख दिया

देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैनें तो सब हिसाब-ए-जाँ बरसर-ए-आम रख दिया

उसने नज़र-नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे
मैनें तो उसके पाँओं में सारा कलाम रख दिया

शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मैकशी रही
उसने जो फेर ली नज़र मैनें भी जाम रख दिय

और “फ़राज़” चाहिये कितनी मुहब्बतें तुझे
के माँओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

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