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Ahmed Faraz Ghazal – किस को गुमाँ है अबके मेरे साथ तुम भी थे

किस को गुमाँ है अबके मेरे साथ तुम भी थे,
हाय वो रोज़ो-शब के मेरे साथ तुम भी थे

यादश बख़ैर अहदे-गुज़िश्ता की सोहबतें,
एक दौर था अजब के मेरे साथ तुम भी थे

बे-महरी-ए-हयात की शिद्दत के बावजूद,
दिल मुतमईन था जब के मेरे साथ तुम भी थे

मैं और तकाबिले- ग़मे-दौराँ का हौसला,
कुछ बन गया सबब के मेरे साथ तुम भी थे

इक ख़्वाब हो गई है रह-रस्मे- दोसती,
एक वहम -सा है अब के मेरे साथ तुम भी थे

वो बज़्म मेरे दोस्त याद तो होगी तुम्हें “फराज़”
वो महफ़िले-तरब के मेरे साथ तुम भी थे



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