Ahmed Faraz Ghazal – ये क्या के सब से बयाँ दिल की हालतें करनी

ये क्या के सब से बयाँ दिल की हालतें करनी
“फ़राज़” तुझको न आईं मुहब्बतें करनी

ये क़ुर्ब क्या है के तू सामने है और हमें
शुमार अभी से जुदाई की स’अतें करनी

कोई ख़ुदा हो के पत्थर जिसे भी हम चाहें
तमाम उम्र उसी की इबादतें करनी

सब अपने अपनी क़रीने से मुंतज़िर उसके
किसी को शुक्र किसी को शिकायतें करनी

हम अपने दिल से हैं मजबूर और लोगों को
ज़रा सी बात पे बरपा क़यामतें करनी

मिलें जब उनसे तो मुबहम सी गुफ़्तगू करना
फिर अपने आप से सौ-सौ वज़ाहतें करनी

ये लोग कैसे मगर दुश्मनी निभातें हैं
हमीं को रास न आईं मुहब्बतें करनी

कभी “फ़राज़” नये मौसमों में रो देना
कभी तलाश पुरानी रक़ाबतें करनी

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