Ahmed Faraz Ghazal – वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा

वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा
अगर चला है तो जो कुछ मुझे दिया ले जा

मक़ाम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ आ गया है फिर जानाँ
ये ज़ख़्म मेरे सही तीर तो उठा ले जा

यही है क़िस्मत-ए-सहरा यही करम तेरा
कि बूँद-बूँद अता कर घटा-घटा ले जा

ग़ुरूर-ए-दोस्त से इतना भी दिलशिकस्ता न हो
फिर उठ के सामने दामन-ए-इल्तजा ले जा

नदामतें हों तो सर बार-ए-दोश होता है
“फ़राज़” जाँ के एवज़ आबरू बचा ले जा

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