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Ahmed Faraz Ghazal – शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो

शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदायें मुझे न दो

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो

ऐसा कहीं न हो के पलटकर न आ सकूँ
हर बार दूर जा के सदायें मुझे न दो

कब मुझ को ऐतेराफ़-ए-मुहब्बत न था “फ़राज़”
कब मैं ने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो

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