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Ahmed Faraz Ghazal – साक़िया एक नज़र जाम से पहले-पहले

साक़िया एक नज़र जाम से पहले-पहले
हम को जाना है कहीं शाम से पहले-पहले

ख़ुश हो ऐ दिल! के मुहब्बत तो निभा दी तूने
लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले-पहले

अब तेरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं
कितनी रग़बत थी तेरे नाम से पहले-पहले

सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की
वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले-पहले

कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’
ग़ैर-मारूफ़-से गुमनाम-से पहले-पहले

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