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Category: Ahmed Faraz Ghazal Lyrics

Ahmed Faraz Ghazal – देख ये हौसला मेरा, मेरे बुज़दिल दुश्मन

देख ये हौसला मेरा, मेरे बुज़दिल दुश्मन
तुझ को लश्कर में पुकारा , तन-ए-तन्हा हो कर

उस शाह-ए-हुस्न के दर पर है फ़क़ीरों का हुज़ूम
यार हम भी ना करें अर्ज़-ए-तमन्ना जा कर

हम तुझे मना तो करते नहीं जाने से ‘फ़राज़’
जा उसी दर पे मगर, हाथ ना फैला जा कर

Ahmed Faraz Ghazal – रातें हैं उदास दिन कड़े हैं

रातें हैं उदास दिन कड़े हैं,
ऐ दिल तेरे हौसले बड़े हैं,

ऐ यादे-हबीब साथ देना,
कुछ मरहले सख़्त आ पड़े हैं,

रूकना हो अगर तो सौ बहाने,
जाना हो तो रास्ते बड़े हैं,

अब किसे बतायें वजहे-गिरीया,
जब आप भी साथ रो पड़े हैं,

अब जाने कहाँ नसीब ले जायें,
घर से तो ‘फ़राज़’ चल पड़े हैं,


Ahmed Faraz Ghazal – दिल बहलता है कहाँ अंजुम-ओ-महताब से भी

दिल बहलता है कहाँ अंजुम-ओ-महताब से भी
अब तो हम लोग गए दीदा-ए-बेख़्वाब से भी

रो पड़ा हूँ तो कोई बात ही ऐसी होगी
मैं के वाक़िफ़ था तेरे हिज्र के आदाब से भी

कुछ तो उस आँख का शेवा है खफ़ा हो जाना
और कुछ भूल हुई है दिल-ए-बेताब से भी

ऐ समंदर की हवा तेरा करम भी मालूम
प्यास साहिल की तो बुझती नहीं सैलाब से भी

कुछ तो उस हुस्न को जाने है ज़माना सारा
और कुछ बात चली है मेरे एहबाब से भी

Ahmed Faraz Ghazal – वो जो आ जाते थे आँखों में सितारे लेकर

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वो जो आ जाते थे आँखों में सितारे लेकर
जाने किस देस गए ख़्वाब हमारे लेकर

छाओं में बैठने वाले ही तो सबसे पहले
पेड़ गिरता है तो आ जाते हैं आरे लेकर

वो जो आसूदा-ए-साहिल हैं इन्हें क्या मालूम
अब के मौज आई तो पलटेगी किनारे लेकर

ऐसा लगता है के हर मौसम-ए-हिज्राँ में बहार
होंठ रख देती है शाख़ों पे तुम्हारे लेकर

शहर वालों को कहाँ याद है वो ख़्वाब फ़रोश
फिरता रहता था जो गलियों में गुब्बारे लेकर

नक़्द-ए-जान सर्फ़ हुआ क़ुल्फ़त-ए-हस्ती में ‘फ़राज़’
अब जो ज़िन्दा हैं तो कुछ सांस उधारे लेकर


Ahmed Faraz Ghazal – किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की

किसी से दिल की हिक़ायत कभी कहा नहीं की,
वगर्ना ज़िन्दगी हमने भी क्या से क्या नहीं की,

हर एक से कौन मोहब्बत निभा सकता है,
सो हमने दोस्ती-यारी तो की वफ़ा नहीं की,

शिकस्तगी में भी पिंदारे-दिल सलामत है,
कि उसके दर पे तो पहुंचे मगर सदा नहीं की,

शिक़ायत उसकी नहीं है के उसने ज़ुल्म किया,
गिला तो ये है के ज़ालिम ने इंतेहा नहीं की,

वो नादेहंद अगर था तो फिर तक़ाज़ा क्या,
के दिल तो ले गया क़ीमत मगर अदा नहीं की,

अजीब आग है चाहत की आग भी के ‘फ़राज़’,
कहीं जला नहीं की और कहीं बुझा नहीं की


Ahmed Faraz Ghazal – एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते?

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एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते?
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते?

जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते?
ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते?

मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते?

लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो
तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यों नहीं देते?

अब शिद्दते ग़म से मेरा दम घुटने लगा है
तुम रेशमी ज़ुल्फों की हवा क्यों नहीं देते

रह रह के न तड़पाओ ऐ बेदर्द मसीहा
हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यों नहीं देते ?

जब मेरी वफाओं पे यकीं तुमको नहीं है
तो मुझको निगाहों से गिरा क्यों नहीं देते?

साया हूँ तो साथ ना रखने का सबब क्या ‘फ़राज़’,
पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते?

Ahmed Faraz Ghazal – जो रंजिशें थी जो दिल में गुबार था ना गया

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जो रंजिशें थी जो दिल में गुबार था ना गया,
कि अब की बार गले मिल के भी गिला ना गया,

अब उस के वादा-ए-फ़र्दान को भी तरसते हैं,
कल उसकी बात पे क्यूँ ऐतबार आ ना गया,

अब उसके हिज्र में रोऐं या वस्ल में खुश हों,
वो दोस्त हो भी तो समझो कि दोस्ताना गया,

निगाहे-यार का क्या है हुई हुई ना हुई,
ये दिल का दर्द है प्यारे गया गया ना गया,

सभी को जान थी प्यारी सभी थे लब-बस्ता,
बस इक ‘फ़राज़’ था ज़ालिम से चुप रहा ना गया,

Ahmed Faraz Ghazal – ज़िन्दगी यूँ थी कि जीने का बहाना तू था

ज़िन्दगी यूँ थी कि जीने का बहाना तू था
हम फ़क़त जेबे-हिकायत थे फ़साना तू था

हमने जिस जिस को भी चाहा तेरे हिज्राँ में वो लोग
आते जाते हुए मौसम थे ज़माना तू था

अबके कुछ दिल ही ना माना क पलट कर आते
वरना हम दरबदरों का तो ठिकाना तू था

यार अगियार कि हाथों में कमानें थी फ़राज़
और सब देख रहे थे कि निशाना तू था

Ahmed Faraz Ghazal – ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या

ग़ज़ल सुन के परेशां हो गए क्या,
किसी के ध्यान में तुम खो गए क्या,

ये बेगाना-रवी पहले नहीं थी,
कहो तुम भी किसी के हो गए क्या,

ना पुरसीश को ना समझाने को आए,
हमारे यार हम को रो गए क्या,

अभी कुछ देर पहले तक यहीं थी,
ज़माना हो गया तुमको गए क्या,

किसी ताज़ा रफ़ाक़त की ललक है,
पुराने ज़ख़्म अच्छे हो गए क्या,

पलट कर चाराग़र क्यों आ गए हैं,
शबे-फ़ुर्क़त के मारे सो गए क्या,

‘फ़राज़’ इतना ना इतरा होसले पर,
उसे भूले ज़माने हो गए क्या

Ahmed Faraz Ghazal – गुज़रे हुए तवील ज़माने के बाद भी

गुज़रे हुए तवील ज़माने के बाद भी,
दिल में रहा वो छोड़ के जाने के बाद भी,

पहलू में रह के दिल नहीं दिया है बहुत फ़रेब,
रखा है उसको याद भुलाने के बाद भी,

गो तू यहाँ नहीं है मगर तू यहीं पे है,
तेरा ही ज़िक्र है मेरे जाने के बाद भी,

लगता है कुछ कहा ही नहीं है उसे ‘फ़राज़’,
दिल का तमाम हाल सुनाने के बाद भी,

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