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Category: Ahmed Faraz Ghazal Lyrics

Ahmed Faraz Ghazal – साथ रोती थी मेरे साथ हंसा करती थी

साथ रोती थी मेरे साथ हंसा करती थी
वो लड़की जो मेरे दिल में बसा करती थी

मेरी चाहत की तलबगार थी इस दर्जे की
वो मुसल्ले पे नमाज़ों में दुआ करती थी

एक लम्हे का बिछड़ना भी गिरां था उसको
रोते हुए मुझको ख़ुद से जुदा करती थी

मेरे दिल में रहा करती थी धड़कन बनकर
और साये की तरह साथ रहा करती थी

रोग दिल को लगा बैठी अंजाने में
मेरी आगोश में मरने की दुआ करती थी

बात क़िस्मत की है ‘फ़राज़’ जुदा हो गए हम
वरना वो तो मुझे तक़दीर कहा करती थी

Ahmed Faraz Ghazal – थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का,
और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का,

वो कौन कीमिया-गर था के जो बिखेर गया,
तेरे गुलाब से चेहरे पे ज़र उदासी का,

मेरे वजूद के खि़ल्वते-क़दे में कोई तो था,
जो रख गया है दिया ताक़ पर उदासी का,

मैं तुझसे कैसे कहूँ यार-ए-मेहरबां मेरे,
के तू ही इलाज़ है मेरी हर उदासी का,

ये अब जो आग का दरिया मेरे वजूद में है,
यही तो पहले-पहल था शरार उदासी का,

ना जाने आज कहाँ खो गया सितार-ए-शाम,
वो मेरा दोस्त, मेरा हमसफ़र उदासी का,

‘फ़राज़’ दीदा-ए-पुराब में ना ढूंढ उसे,
के दिल की तह में कहीं है गोहर उदासी का,

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Ahmed Faraz Ghazal – जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है

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जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है,
एक समन्दर मेरी आँखों से बहा करता है,

उसकी बातें मुझे खुश्बू की तरह लगती है,
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है,

मेरे दोस्त की पहचान ये ही काफ़ी है,
वो हर शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है,

और तो कोई सबब उसकी मोहब्बत का नहीं,
बात इतनी है के वो मुझसे जफ़ा करता है,

जब ख़ज़ाँ आएगी तो लौट आएगा वो भी ‘फ़राज़’,
वो बहारों में ज़रा कम ही मिला करता है,

Ahmed Faraz Ghazal – कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता

कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता

आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू से
और ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता

वो राहत-ए-जान है इस दरबदरी में
ऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता

हम दोहरी अज़ीयत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
पाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता

दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है
और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

पागल होते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

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Ahmed Faraz Ghazal – नहीं जो दिल में जगह तो नज़र में रहने दो

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नहीं जो दिल में जगह तो नज़र में रहने दो
मेरी हयात को अपने असर में रहने दो

कोई तो ख़्वाब मेरी रात का मुक़द्दर हो
कोई तो अक्स मेरी चश्म-ए-तर में रहने दो

मैं अपनी सोच को तेरी गली मैं छोड़ आया
तो अपनी याद को मेरे हुनर में रहने दो

ये मंजिलें तो किसी और का मुक़द्दर हैं
मुझे बस अपने जूनून के सफ़र में रहने दो

हकीक़तें तो बहुत तल्ख़ हो गयी हैं “फ़राज़”
मेरे वजूद को ख़्वाबों के घर में रहने दो

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Ahmed Faraz Ghazal – कभी मोम बन के पिघल गया कभी गिरते गिरते सँभल गया

कभी मोम बन के पिघल गया कभी गिरते गिरते सँभल गया
वो बन के लम्हा गुरेज़ का मेरे पास से निकल गया

उसे रोकता भी तो किस तरह के वो शख़्स इतना अजीब था
कभी तड़प उठा मेरी आह से कभी अश्क़ से न पिघल सका

सरे-राह मिला वो अगर कभी तो नज़र चुरा के गुज़र गया
वो उतर गया मेरी आँख से मेरे दिल से क्यूँ न उतर सका

वो चला गया जहाँ छोड़ के मैं वहाँ से फिर न पलट सका
वो सँभल गया था ‘फ़राज़’ मगर मैं बिखर के न सिमट सका

Ahmed Faraz Ghazal – तुझ पर भी न हो गुमान मेरा

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तुझ पर भी न हो गुमान मेरा
इतना भी कहा न मान मेरा

मैं दुखते हुये दिलों का ईशा
और जिस्म लहुलुहान मेरा

कुछ रौशनी शहर को मिली तो
जलता है जले मकान मेरा

ये जात ये कायनात क्या है
तू जान मेरी जहान मेरा

जो कुछ भी हुआ यही बहुत है
तुझको भी रहा है ध्यान मेरा

Ahmed Faraz Ghazal – किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं

किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं ।

जब वो थे तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।

कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।

उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।

Ahmed Faraz Ghazal – तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये

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तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये

फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये

क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे
अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये

ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये

समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर
फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये

अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम
अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये

रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को “फ़राज़” तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये

Ahmed Faraz Ghazal – ये क्या के सब से बयाँ दिल की हालतें करनी

ये क्या के सब से बयाँ दिल की हालतें करनी
“फ़राज़” तुझको न आईं मुहब्बतें करनी

ये क़ुर्ब क्या है के तू सामने है और हमें
शुमार अभी से जुदाई की स’अतें करनी

कोई ख़ुदा हो के पत्थर जिसे भी हम चाहें
तमाम उम्र उसी की इबादतें करनी

सब अपने अपनी क़रीने से मुंतज़िर उसके
किसी को शुक्र किसी को शिकायतें करनी

हम अपने दिल से हैं मजबूर और लोगों को
ज़रा सी बात पे बरपा क़यामतें करनी

मिलें जब उनसे तो मुबहम सी गुफ़्तगू करना
फिर अपने आप से सौ-सौ वज़ाहतें करनी

ये लोग कैसे मगर दुश्मनी निभातें हैं
हमीं को रास न आईं मुहब्बतें करनी

कभी “फ़राज़” नये मौसमों में रो देना
कभी तलाश पुरानी रक़ाबतें करनी

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