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Category: Ahmed Faraz Ghazal Lyrics

Ahmed Faraz Ghazal – तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ

तड़प उठूँ भी तो ज़ालिम तेरी दुहाई न दूँ
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी तुझे दिखाई न दूँ

तेरे बदन में धड़कने लगा हूँ दिल की तरह
ये और बात के अब भी तुझे सुनाई न दूँ

ख़ुद अपने आपको परखा तो ये नदामत है
के अब कभी उसे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दूँ

मुझे भी ढूँढ कभी मह्व-ए-आईनादारी
मैं तेरा अक़्स हूँ लेकिन तुझे दिखाई न दूँ

Ahmed Faraz Ghazal – तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़

तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चिराग़

अपनी महरूमियों पे शर्मिन्दा हैं
ख़ुद नहीं रखते तो औरों के बुझाते हैं चिराग़

बस्तियाँ चाँद सितारों पे बसाने वाले
कुर्रा-ए-अर्ज़ बुझाते जाते हैं चिराग़

क्या ख़बर है उनको के दामन भी भड़क उठते हैं
जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चिराग़

ऐसी तारीकीयाँ आँखों में बसी हैं “फ़राज़”
रात तो रात हम दिन को जलाते हैं चिराग़




Ahmed Faraz Ghazal – शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो

शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदायें मुझे न दो

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो

ऐसा कहीं न हो के पलटकर न आ सकूँ
हर बार दूर जा के सदायें मुझे न दो

कब मुझ को ऐतेराफ़-ए-मुहब्बत न था “फ़राज़”
कब मैं ने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो

Ahmed Faraz Ghazal – सब लोग लिये संग-ए-मलामत निकल आये

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सब लोग लिये संग-ए-मलामत निकल आये
किस शहर में हम अहल-ए-मुहब्बत निकल आये

अब दिल की तमन्ना है तो ऐ काश यही हो
आँसू की जगह आँख से हसरत निकल आये

हर घर का दिया गुल न करो तुम के न जाने
किस बाम से ख़ुरशीद-ए-क़यामत निकल आये

जो दरपा-ए-पिन्दार हैं उन क़त्लगहों से
जाँ देके भी समझो के सलामत निकल आये

ऐ हमनफ़सों कुछ तो कहो अहद-ए-सितम की
इक हर्फ़ से मुम्किन है हिकायत निकल आये

यारो मुझे मसलूब करो तुम के मेरे बाद
शायद के तुम्हारा क़द-ओ-क़ामत निकल आये

Ahmed Faraz Ghazal – सकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ

सकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ
बड़ा उदास समाँ है क़रीब आ जाओ

न तुमको ख़ुद पे भरोसा न हमको ज़ोम-ए-वफ़ा
न ऐतबार-ए-जहाँ है क़रीब आ जाओ

राह-ए-तलब में किसी को ध्यान नहीं
हुजूम-ए-हमसफ़राँ है क़रीब आ जाओ

जो दश्त-ए-इश्क़ में बिछड़ें वो उम्र भर न मिले
यहाँ धुआँ ही धुआँ है क़रीब आ जाओ

ये आँधियाँ हैं तो शहर-ए-वफ़ा की ख़ैर नहीं
ज़माना ख़ाकफ़शाँ है क़रीब आ जाओ

फ़ाक़िह-ए-शहर की मजलिस नहीं के दूर रहो
ये बज़्म-ए-पीर-ए-मग़ाँ है क़रीब आ जाओ

“फ़राज़” दूर के सूरज ग़रूब समझे गये
ये दौर-ए-कमनज़ारा है क़रिब आ जाओ




Ahmed Faraz Ghazal – साक़िया एक नज़र जाम से पहले-पहले

साक़िया एक नज़र जाम से पहले-पहले
हम को जाना है कहीं शाम से पहले-पहले

ख़ुश हो ऐ दिल! के मुहब्बत तो निभा दी तूने
लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले-पहले

अब तेरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं
कितनी रग़बत थी तेरे नाम से पहले-पहले

सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की
वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले-पहले

कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’
ग़ैर-मारूफ़-से गुमनाम-से पहले-पहले

Ahmed Faraz Ghazal – फिर उसी रहगुज़र पर शायद

फिर उसी रहगुज़र पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद

जान पहचान से ही क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद

जिन के हम मुन्तज़िर[1] रहे उनको
मिल गये और हमसफ़र शायद

अजनबीयत की धुंध छंट जाए
चमक उठे तेरी नज़र शायद

जिंदगी भर लहू रुलाएगी
यादे -याराने-बेख़बर[2] शायद

जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं “फ़राज़”
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद
शब्दार्थ:

1. प्रतीक्षारत
2. भूले बिसरे दोस्तों की यादें




Ahmed Faraz Ghazal – क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी

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क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी
हँसती हुई रात रो पड़ी थी

हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी

ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादें
जब आप से दोस्ती बड़ी थी

जाते तो किधर को तेरे वहशी
ज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी

ग़म थे कि “फ़राज़” आँधियाँ थी
दिल था कि “फ़राज़” पन्खुदई थी

Ahmed Faraz Ghazal – मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़’अत

मैं तो आवारा शायर हूँ मेरी क्या वक़’अत
एक दो गीत परेशान से गा लेता हूँ

गहे गहे किसी नाकाम शराबी की तरह
एक दो ज़हर के साग़र भी चढ़ा लेता हूँ

तू के इक वादी-ए-गुलरंग की शहज़ादी है
एक बेकार से इन्साँ के लिये वक़्फ़ न हो

तेरे ख़्वाबों के जज़ीरों में बड़ी रौनक़ है
एक अंजान से तूफ़ाँ के लिये वक़्फ़ न हो

Ahmed Faraz Ghazal – वो तफ़व्वुतें हैं मेरे खुदा कि ये तू नहीं कोई और है

वो तफ़व्वुतें हैं मेरे खुदा कि ये तू नहीं कोई और है
कि तू आसमां पे हो तो हो, पये सरे जमीं कोई और है

वो जो रास्ते थे, वफ़ा के थे, ये जो मन्जिलें है, सजा की हैं
मेरा हमसफ़र कोई और था मेरा हमनशीं कोई और है

मेरे जिस्मों जान में तेरे सिवा नहीं और कोई दूसरा
मुझे फिर भी लगता है इस तरह कि कहीं कहीं कोई और है

मैं असीर अपने गिजाल का, मैं फ़कीर दश्ते विसाल का
जो हिरन को बांध के ले गया वो सुबुक्तगीं कोई और है

मैं अजब मुसाफिर-ए-बेईमां, कि जहां जहां भी गया वहां
मुझे लगा कि मेरा खाकदान, ये जमीं नहीं कोई और है

रहे बेखबर मेरे यार तक, कभी इस पे शक, कभी उस पे शक
मेरे जी को जिसकी रही ललक, वो कमर जबीं कोई और है

ये जो चार दिन के नदीम हैं, इन्हे क्या ’फ़राज़’ कोई कहे
वो मोहब्बतें, वो शिकायतें, मुझे जिससे थीं, वो कोई और है.

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