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Category: Allama Iqbal Ghazal Lyrics

Allama Iqbal Ghazal – Tire Ishq Ki Inteha Chahta Hu

तिरे इश्क़ की इंतहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख, क्या चाहता हूँ
सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ
वो जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आपका सामना चाहता हूँ
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऎ अहले-महफ़िल
चिराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ

Allama Iqbal Ghazal – Sakhtiyan Karta Hu Dil Par Gair Se Gaalif Hun Main

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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
हाय क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील
जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं

बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो
तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

ढूँढता फिरता हूँ ऐ “इक़बाल” अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं

Allama Iqbal Ghazal – Gulzar-A-Hast-O-Bu Na Beganavaar Dekh

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख
है देखने की चीज़ इसे बार बार देख

आया है तो जहाँ में मिसाल-ए-शरर देख
दम दे नजये हस्ती-ए-नापायेदार देख

माना के तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मेरा इंतज़ार देख

खोली हैं ज़ौक़-ए-दीद ने आँखें तेरी तो फिर
हर रहगुज़र में नक़्श-ए-कफ़-ए-पाय-ए-यार देख

Allama Iqbal Ghazal – Parishan Hoke Meri Khak Aakhir Dil Na Ban Jaye

परीशाँ होके मेरी खाक आखिर दिल न बन जाये
जो मुश्किल अब हे या रब फिर वही मुश्किल न बन जाये

न करदें मुझको मज़बूरे नवा फिरदौस में हूरें
मेरा सोज़े दरूं फिर गर्मीए महेफिल न बन जाये

कभी छोडी हूई मज़िलभी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में गमें मंज़िल न बन जाये

कहीं इस आलमें बे रंगो बूमें भी तलब मेरी
वही अफसाना दुन्याए महमिल न बन जाये

अरूज़े आदमे खाकी से अनजुम सहमे जातें है
कि ये टूटा हुआ तारा महे कामिल न बन जा

Allama Iqbal Ghazal – Ajab Vayiz Ki Din-Daari Hai Ya Rab

अजब वाइज़ की दीन-दारी है या रब
अदावत है इसे सारे जहाँ से

कोई अब तक न ये समझा कि इंसाँ
कहाँ जाता है आता है कहाँ से

वहीं से रात को ज़ुल्मत मिली है
चमक तारों ने पाई है जहाँ से

हम अपनी दर्द-मंदी का फ़साना
सुना करते हैं अपने राज़दाँ से

बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें
लरज़ जाता है आवाज़-ए-अज़ाँ से


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Allama Iqbal Ghazal – Tu Abhi Rehguzar Mein Hai Kaid-A-Makaam Se Guzar

तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मकाम से गुज़र
मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र, पारेस-ओ-शाम से गुज़र

जिस का अमाल है बे-गरज़, उस की जज़ा कुछ और है
हूर-ओ-ख़याम से गुज़र, बादा-ओ-जाम से गुज़र

गर्चे है दिलकुशा बहोत हुस्न-ए-फ़िरन्ग की बहार
तायरेक बुलंद बाल दाना-ओ-दाम से गुज़र

कोह शिग़ाफ़ तेरी ज़रब तुझसे कुशाद शर्क़-ओ-ग़रब
तेज़े-हिलाहल की तरह ऐश-ओ-नयाम से गुज़र

तेरा इमाम बे-हुज़ूर, तेरी नमाज़ बे-सुरूर
ऐसी नमज़ से गुज़र, ऐसे इमाम से गुज़र

Allama Iqbal Ghazal – Akal Ne Ek Din Ye Dil Se Kaha

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अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा
अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा
भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं

दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं

राज़े-हस्ती को तू समझती है
और आँखों से देखता हूँ मैं

Allama Iqbal Ghazal – Taskin Na Ho Jis Se Vo Raaz Badal Dalo

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तस्कीन न हो जिस से वो राज़ बदल डालो
जो राज़ न रख पाए हमराज़ बदल डालो

तुम ने भी सुनी होगी बड़ी आम कहावत है
अंजाम का जो हो खतरा आगाज़ बदल डालो

पुर-सोज़ दिलों को जो मुस्कान न दे पाए
सुर ही न मिले जिस में वो साज़ बदल डालो

दुश्मन के इरादों को है ज़ाहिर अगर करना
तुम खेल वोही खेलो, अंदाज़ बदल डालो

ऐ दोस्त! करो हिम्मत कुछ दूर सवेरा है
अगर चाहते हो मंजिल तो परवाज़ बदल डालो

Allama Iqbal Ghazal – Mumkin Hai Ke Tu Jisko Samjhta Hai Baharan

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मुम्किन है के तु जिसको समझता है बहाराँ
औरों की निगाहों में वो मौसम हो ख़िज़ाँ का

है सिल-सिला एहवाल का हर लहजा दगरगूँ
अए सालेक-रह फ़िक्र न कर सूदो-ज़याँ का

शायद के ज़मीँ है वो किसी और जहाँ की
तू जिसको समझता है फ़लक अपने जहाँ का

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