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Category: Bashir Badr Ghazal Lyrics

Bashir Badr Ghazal – वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है

बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच न तुझपे आयेगी
ये ज़ुबाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है

मैं ये मानता हूँ मेरे दिये तेरी आँधियोँ ने बुझा दिये
मगर इक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है

Bashir Badr Ghazal – राख हुई आँखों की शम्एं, आँसू भी बेनूर हुए

राख हुई आँखों की शम्एं, आँसू भी बेनूर हुए,
धीरे धीरे मेरा दिल पत्थर सा होता जाता है।

अपने दिल है एक परिन्दा जिसके बाजू टूटे हैं,
हसरत से बादल को देखे बादल उड़ता जाता है।

सारी रात बरसने वाली बारीश का मैं आँचल हूँ,
दिन में काँटों पर फैलाकर मुझे सुखाया जाता है।

हमने तो बाजार में दुनिया बेची और खरीदी है,
हमको क्या मालूम किसी को कैसे चाहा जाता है।

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Bashir Badr Ghazal – ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है

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ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है
दुनिया उन्हीं फूलों को पैरों से मसलती है

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख दे
यूँ याद तेरी शब भर सीने में सुलगती है

आ जाता है ख़ुद खींच कर दिल सीने से पटरी पर
जब रात की सरहद से इक रेल गुज़रती है

आँसू कभी पलकों पर ता देर नहीं रुकते
उड़ जाते हैं ये पंछी जब शाख़ लचकती है

ख़ुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये
बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है

Bashir Badr Ghazal – ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है

ये चिराग़ बेनज़र है ये सितारा बेज़ुबाँ है
अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है

वही शख़्स जिसपे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बदगुमाँ है

कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ है

मेरे साथ चलनेवाले तुझे क्या मिला सफ़र में
वही दुख भरी ज़मीं है वही ग़म का आस्माँ है

मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुत्मईन[१] रहा हूँ
तेरा जिस्म बेतग़ैय्युर[२] है मेरा प्यार जाविदाँ[३] है

उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है

शब्दार्थ:

1.↑ संतुष्ट
2.↑ जो बदले नहीं
3.↑ अमर

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Bashir Badr Ghazal – याद किसी की चाँदनी बन कर कोठे कोठे उतरी है

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याद किसी की चाँदनी बन कर कोठे कोठे उतरी है
याद किसी की धूप हुई है ज़ीना ज़ीना उतरी है

रात की रानी सहन-ए-चमन में गेसू खोले सोती है
रात-बेरात उधर मत जाना इक नागिन भी रहती है

तुम को क्या तुम ग़ज़लें कह कर अपनी आग बुझा लोगे
उस के जी से पूछो जो पत्थर की तरह चुप रहती है

पत्थर लेकर गलियों गलियों लड़के पूछा करते हैं
हर बस्ती में मुझ से आगे शोहरत मेरी पहुँचती है

मुद्दत से इक लड़की के रुख़्सार की धूप नहीं आई
इसी लिये मेरे कमरे में इतनी ठंडक रहती है

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Bashir Badr Ghazal – मोम की ज़िन्दगी घुला करना

मोम की ज़िन्दगी घुला करना
कुछ किसी से न तज़करा करना

मेरा बचपन था आईने जैसा
हर खिलौने का मुँह तका करना

चेहरा चेहरा मेरी किताबें हैं
पढ़ने वालो मुझे पढ़ा करना

ये रिवायत बहुत पुरानी है
नींद में रेत पर चला करना

रास्ते में कई खंडहर होंगे
शह-सवारो वहाँ रुका करना

जब बहुत हँस चुको तो चेहरे को
आँसुओं से भी धो लिया करना

फूल शाख़ों के हों कि आँखों के
रास्ते रास्ते चुना करना

Bashir Badr Ghazal – मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं

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मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं
हाये मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं

हम अभी तक हैं गिरफ़्तार-ए-मुहब्बत यारो
ठोकरें खा के सुना था कि सम्भल जाते हैं

ये कभी अपनी जफ़ा पर न हुआ शर्मिन्दा
हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं

उम्र भर जिनकी वफ़ाओं पे भरोसा कीजे
वक़्त पड़ने पे वही लोग बदल जाते हैं

Bashir Badr Ghazal – मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है

मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है

खुदा इस शहर को महफ़ूज़ रखे
ये बच्चो की तरह हँसता बहुत है

मैं हर लम्हे मे सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है

मेरा दिल बारिशों मे फूल जैसा
ये बच्चा रात मे रोता बहुत है

वो अब लाखों दिलो से खेलता है
मुझे पहचान ले, इतना बहुत है

Bashir Badr Ghazal – भूल शायद बहुत बड़ी कर ली

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भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली

तुम मुहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िन्दगी कर ली

उस ने देखा बड़ी इनायत से
आँखों आँखों में बात भी कर ली

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी कर ली

हम नहीं जानते चिराग़ों ने
क्यों अंधेरों से दोस्ती कर ली

धड़कनें दफ़्न हो गई होंगी
दिल में दीवार क्यों खड़ी कर ली

Bashir Badr Ghazal – मान मौसम का कहा, छाई घटा, जाम उठा

मान मौसम का कहा, छाई घटा, जाम उठा
आग से आग बुझा, फूल खिला, जाम उठा

पी मेरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ
भूल जा शिकवा-गिला, हाथ मिला, जाम उठा

हाथ में जाम जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जायेगा क़िस्मत का लिखा, जाम उठा

एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा
देर क्या करना यहाँ, हाथ बढा़, जाम उठा

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ
मैकदे में कोई छोटा न बड़ा, जाम उठा

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