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Category: Daagh Dehlvi Ghazal Lyrics

Daagh Dehlvi Ghazal – Rasm-A-Ulfat Sikha Gaya Koi

रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई
दिल की दुनिया पे छा गया कोई

ता कयामत किसी तरह न बुझे
आग ऐसी लगा गया कोई

दिल की दुनिया उजाड़ सी क्यूं है
क्या यहां से चला गया कोई

वक्त-ए-रुखसत गले लगा कर ‘दाग़’
हंसते हंसते रुला गया कोई

Daagh Dehlvi Ghazal – Luft Ishq Mein Paye Hai Ki Jee Jaanta Hai

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है

जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाए हैं कि जी जानता है

तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़
वो मेरे दिल में समाए हैं कि जी जानता है

इन्हीं क़दमों ने तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम
ख़ाक में इतने मिलाए हैं कि जी जानता है

दोस्ती में तेरी दरपर्दा हमारे दुश्मन
इस क़दर अपने पराए हैं कि जी जानता है




Daagh Dehlvi Ghazal – Ye Jo Hai Hukm Mere Paas Na Aaye Koi

ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई

ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़री
दिल दिखाने का हो तो दिखाए कोई

हो चुका ऐश का जलसा तो मुझे ख़त पहुँचा
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई

तर्के-बेदाद की तुम दाद न पाओ मुझसे
करके एहसान ,न एहसान जताए कोई

क्यों वो मय-दाख़िले-दावत ही नहीं ऐ वाइज़
मेहरबानी से बुलाकर जो पिलाए कोई

सर्द -मेहरी से ज़माने के हुआ है दिल सर्द
रखकर इस चीज़ को क्या आग लगाए कोई

आपने दाग़ को मुँह भी न लगाया, अफ़सोस
उसको रखता था कलेजे से लगाए कोई

Daagh Dehlvi Ghazal – Mere Kabu Mein Na Pehro Dil-A-Nashad Aaya

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मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया

दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात
हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद आया

लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए- फुर्कत मुझ से
आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया

आप की महिफ़ल में सभी कुछ है मगर ‘दाग़’ नहीं
मुझ को वो ख़ाना-ख़राब आज बहोत याद आया

Daagh Dehlvi Ghazal – Muhabbat Mein Kare Kya Kuchh Kisi Se Ho Nahi Sakta

मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता
मेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकता

न रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ का
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता

ख़ुदा जब दोस्त है ऐ ‘दाग़’ क्या दुश्मन से अन्देशा
हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता




Daagh Dehlvi Ghazal – Na Rawa Kahiye Na Saja Kahiye

न रवा कहिये न सज़ा कहिये
कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये

दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़
इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये

वो मुझे क़त्ल कर के कहते हैं
मानता ही न था ये क्या कहिये

आ गई आप को मसिहाई
मरने वालो को मर्हबा कहिये

होश उड़ने लगे रक़ीबों के
“दाग” को और बेवफ़ा कहिये

Daagh Dehlvi Ghazal – Dard Ban Ke Dil Mein Aana

दर्द बन के दिल में आना , कोई तुम से सीख जाए
जान-ए-आशिक़ हो के जाना , कोई तुम से सीख जाए
हमसुख़न पर रूठ जाना , कोई तुम से सीख जाए
रूठ कर फिर मुस्कुराना, कोई तुम से सीख जाए
वस्ल की शब[1] चश्म-ए-ख़्वाब-आलूदा[2] के मलते उठे
सोते फ़ित्ने[3] को जगाना,कोई तुम से सीख जाए
कोई सीखे ख़ाकसारी की रविश[4] तो हम सिखाएँ
ख़ाक में दिल को मिलाना,कोई तुम से सीख जाए
आते-जाते यूँ तो देखे हैं हज़ारों ख़ुश-ख़राम[5]
दिल में आकर दिल से जाना,कोई तुम से सीख जाए
इक निगाह-ए-लुत्फ़ पर लाखों दुआएँ मिल गयीं
उम्र को अपनी बढ़ाना,कोई तुम से सीख जाए
जान से मारा उसे, तन्हा जहाँ पाया जिसे
बेकसी में काम आना ,कोई तुम से सीख जाए
क्या सिखाएगा ज़माने को फ़लत तर्ज़-ए-ज़फ़ा
अब तुम्हारा है ज़माना,कोई तुम से सीख जाए
महव-ए-बेख़ुद[6] हो, नहीं कुछ दुनियादारी की ख़बर
दाग़ ऐसा दिल लगाना,कोई तुम से सीख जाए
शब्दार्थ:
1. मिलन की रात
2. नींद से बोझिल आँखें
3. उपद्रव
4. तरीका
5. मस्त चाल
6. ध्यान मग्न




Daagh Dehlvi Ghazal – Sitam Hi Karna Jafa Hi Karna Nigah-A-Luft Kabhi Na Karna

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सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-लुत्फ़ कभी न करना
तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना

कहाँ का आना कहाँ का जाना वो जानते ही नहीं ये रस्में
वहां है वादे की भी ये सूरत कभी तो करना कभी न करना

हमारी मय्यत पे तुम जो आना तो चार आँसू बहा के जाना
ज़रा रहे पास-ए-आबरू भी कहीं हमारी हँसी न करना

वो इक हमारा तरीक़-ए-उल्फ़त कि दुश्मनों से भी मिल के चलना
ये एक शेवा तेरा सितमगर कि दोस्त से दोस्ती न करना

Daagh Dehlvi Ghazal – Hum Tujhse Kis Hawas Ki Falak Justzu Kare

हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें
दिल ही नहीं रहा है जो कुछ आरजू करें

तर-दामनी* पे शेख हमारी ना जाईयो
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वजू* करें

सर ता क़दम ज़ुबां हैं जूं शम’अ गो की हम
पर यह कहाँ मजाल जो कुछ गुफ्तगू करें

है अपनी यह सलाह की सब ज़ाहिदान-ए-शहर
ए दर्द आ की बै’अत-ए-दस्त-ओ-सुबू करें

मिट जाएँ एक आन् में कसरत नुमाईयां
हम आईने के सामने आके जब हू करें

Daagh Dehlvi Ghazal – Husn-A-Ada Bhi Khubi-A-Seerat Mein Chahiye

हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए,
यह बढ़ती दौलत, ऐसी ही दौलत में चाहिए।

आ जाए राह-ए-रास्त पर काफ़िर तेरा मिज़ाज,
इक बंदा-ए-ख़ुदा तेरी ख़िदमत में चाहिए ।

देखे कुछ उनके चाल-चलन और रंग-ढंग,
दिल देना इन हसीनों को मुत में चाहिए ।

यह इश्क़ का है कोई दारूल-अमां नहीं,
हर रोज़ वारदात मुहब्बत में चाहिए ।

माशूक़ के कहे का बुरा मानते हो ‘दाग़‘,
बर्दाश्त आदमी की तबीअत में चाहिए ।

शब्दार्थ :
हुस्न-ए-अदा: बात करने का सलीक़ा,
सीरत: चरित्र,
राह-ए-रास्त: सीधा रास्ता,
दारूल-अमां: शांति स्थल ।

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