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Category: Majrooh Sultanpuri Ghazal Lyrics

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Hum Ko Junun Kya Sikhlate Ho Hum The Preshan Tumse Jiyada

हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा
चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा

चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है
एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा

जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा

हम भी हमेशा क़त्ल हुए अन्द तुम ने भी देखा दूर से लेकिन
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा

ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो “मजरूह” मगर हम
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Khatm-A-Shor-Tufan Tha Door Thi Siyahi Bhi

ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
दम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी

इल्तफ़ात समझूँ या बेरुख़ी कहूँ इस को
रह गई ख़लिश बन कर उसकी कमनिगाही भी

याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्तगीरी पर
अश्क भर के उठी थी मेरी बेगुनाही भी

शमा भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल का
मैं ही अपनी मंज़िल का राहबर भी राही भी

गुम्बदों से पलटी है अपनी ही सदा “मजरूह”
मस्जिदों में की जाके मैं ने दादख़्वाही भी

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Nigah-A-Saki-A-Naamharban Ye Kya Jaane

निगाह-ए-साक़ी-ए-नामहरबाँ ये क्या जाने
कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने

मिली जब उनसे नज़र बस रहा था एक जहाँ
हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने

हयात लग़्ज़िशे-पैहम का नाम है साक़ी
लबों से जाम लगा भी सकूँ ख़ुदा जाने

वो तक रहे थे हमीं हँस के पी गए आँसू
वो सुन रहे थे हमीं कह सके न अफ़साने

ये आग और नहीं दिल की आग है नादाँ
चिराग़ हो के न हो जल बुझेंगे परवाने

फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिये “मजरूह”
शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने


Majrooh Sultanpuri Ghazal – Jala Ke Mashal-A-Jaan Hum Junun Sifat Chale


जला के मशाल-ए-जान हम जुनूं सिफात चले
जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले

दयार-ए-शाम नहीं, मंजिल-ए-सहर भी नहीं
अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले

हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक
ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले

सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चिराग
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले

बचा के लाये हम ऐ यार फिर भी नकद-ए-वफ़ा
अगरचे लुटते हुए रहज़नों के हाथ चले

फिर आई फसल की मानिंद बर्ग-ऐ-आवारा
हमारे नाम गुलों के मुरासिलात चले

बुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ मजरूह
बगल मैं हम भी लिए एक सनम का हाथ चले

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Dushman Ki Dosti Hai Ab Ahle Vatan Ke Sath

दुश्मन की दोस्ती है अब अहले वतन के साथ
है अब खिजाँ चमन मे नए पैराहन के साथ

सर पर हवाए ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ

किसने कहा कि टूट गया खंज़रे फिरंग
सीने पे ज़ख़्मे नौ भी है दाग़े कुहन के साथ

झोंके जो लग रहे हैं नसीमे बहार के
जुम्बिश में है कफ़स भी असीरे चमन के साथ

मजरूह काफ़ले कि मेरे दास्ताँ ये है
रहबर ने मिल के लूट लिया राहजन के साथ

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Kab Tak Malun Jabin Se Us Sang-A-Dar Ko Main

कब तक मलूँ जबीं से उस संग-ए-दर को मैं
ऐ बेकसी संभाल, उठाता हूँ सर को मैं

किस किस को हाय, तेरे तग़ाफ़ुल का दूँ जवाब
अक्सर तो रह गया हूँ, झुका कर नज़र को मैं

अल्लाह रे वो आलम-ए-रुख्सत कि देर तक
तकता रहा हूँ यूँ ही तेरी रेहगुज़र को मैं

ये शौक़-ए-कामयाब, ये तुम, ये फ़िज़ा, ये रात
कह दो तो आज रोक दूँ बढ़कर सहर को मैं


Majrooh Sultanpuri Ghazal – Pehle Sau Bar Idhar Aur Udhar Dekha Hai


पहले सौ बार इधर और उधर देखा है
तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है

हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं
हम ने उस शोख को अए दीदा-ए-तर देखा है

आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो
उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है

क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना
मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Liye Baitha Hai Dil Ek Azme-Bebakana Barso Se

लिए बैठा है दिल इक अ़ज़्मे-बेबाकाना बरसों से
कि इसकी राह में हैं काबा-ओ बुतख़ाना बरसों से

दिले-सादा न समझा, मासिवा-ए-पाकदामानी
निगाहे-यार करती है कोई अफ़साना बरसों से

गुरेज़ा तो नहीं तुझसे मगर तेरे सिवा दिल को
कई ग़म और भी हैं ऐ ग़मे-जानाना बरसों से

मुझे ये फ़िक्र सब की प्यास अपनी प्यास है, साक़ी
तुझे ये ज़िद कि ख़ाली है मेरा पैमाना बरसों से

हज़ारों माहताब आए हज़ारों आफ़ताब आए
मगर हम दम वही है जुल्मते-ग़मख़ाना बरसों से

वही ‘मजरूह’, समझे सब जिसे आवारा-ए-ज़ुल्‍मत
वही है एक शमए-सुर्ख़ का परवाना बरसों से

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Masarraton Ko Ye Ahle-Hawas Na Kho Dete

मसर्रतों को ये अहले-हवस न खो देते
जो हर ख़ुशी में तेरे ग़म को भी समो देते

कहां वो शब कि तेरे गेसुओं के साए में
ख़याले-सुबह से आस्ती भिगो देते

बहाने और भी होते जो ज़िन्दगी के लिए
हम एक बार तेरी आरजू भी खो देते

बचा लिया मुझे तूफां की मौज नें वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते

जो देखते मेरी नज़रो पे बंदिशों के सितम
तो ये नज़ारे मेरी बेबसी पे रो देते

कभी तो यूं भी उमंडते सरश्के-ग़म ‘मजरूह’
कि मेरे ज़ख्मे तमन्ना के दाग धो देते

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Akhir Game-Jana Ko Ae Dil Bad Ke Game-Dauran Hona Tha

आखिर ग़मे-ज़ाना को ऐ दिल बढ़ के ग़मे-दौराँ होना था
इस क़तरे को बनाना था दरिया इस मौज को तूफ़ाँ होना था

हर मोड़ पे मिल जाते हैं अभी फ़िर्दौसे-जनाँ के शैदाई
तुझ को तो अभी कुछ और हसीं ऐ आ़लमे-इम्कां होना था

वो जिसके गुदाज़े-मेहनत से पुरनूर शबिस्ताँ है तेरा
ऐ शोख़ उसी बाज़ू पे तेरी जुल्फ़ों को परीशाँ होना था

आती ही रही है गुलशन में अब के भी बहार आई है तो क्या
है यूँ कि क़फ़स के गोशों से एलाने-बहाराँ होना था

आया है हमारे मुल्क में भी इक दौरे-ज़ुलैख़ाई यानी
अब वो ग़मे-ज़िन्दां देते हैं जिनको ग़मे-ज़िन्दां होना था

अब खुल के कहूँगा हर ग़मे-दिल ‘मजरूह’ नहीं वो वक़्त कि जब
अश्क़ों में सुनाना था मुझको आहों में ग़ज़ल-ख़्वां होना था

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