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Category: Majrooh Sultanpuri Ghazal Lyrics

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Mujhe Sahal Ho Gai Manzile Vo Hawa Ke Rukh Bhi Badal Gaye

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए

वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी जुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए

वही बात जो न वो कह सके मेरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई,
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे-शराब में ढल गए ।

तुझे चश्मे-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है,
तुझे चश्मे-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगी ने पिघल गए

उन्हें कब के रास भी आ चुके तेरी बज़्मे-नाज़ के हादिसे,
अब उठे कि तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गिर के सम्भल गए

मेरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें,
बढ़ी इस क़दर मेरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए ।

Majrooh Sultanpuri Ghazal – Aa Nikal Ke Maidan Mein Dorukhi Ke Khane Se

आ निकल के मैदाँ में दोरुख़ी के ख़ाने से
काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से

अहदे-इन्कि़लाब आया, दौरे-आफ़ताब आया
मुन्तज़िर थीं ये आंखें जिसकी इक ज़माने से

अब ज़मीन गाएगी हल के साज़ पर नग़्मे
वादियों में नाचेंगे हर तरफ़ तराने-से

अहले-दिल उगाएँगे ख़ाक से महो-अंजुम
अब गुहर सुबक होगा जौ के एक दाने से

मनचले गुनेंगे अब रंगो-बू के पैराहन
अब संवर के निकलेगा हुस्‍न कारख़ाने से

आ़म होगा अब हमदम सब पे फ़ैज़ फ़ितरत का
भर सकेंगे अब दामन हम भी इस ख़ज़ाने से

सुनते हम तो क्या सुनते इक बुज़ुर्ग की बातें
सुबह को इलाक़ा क्या शाम के फ़साने से

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