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Category: Ghazal Lyrics In Hindi

Ahmed Faraz Ghazal – दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वो ही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला।

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला।

क्या ख़बर थी जो मेरी जाँ में घुला रहता है
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला।

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला।

तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला।


मरासिम = Relations, Agreements
सर-ए-दार = At the Tomb
ताबीर = Interpretation
तक़ल्लुफ़ = Formality
इख़लास = Sincerity, Love, Selfless Worship

Qateel Shifai Ghazal – ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं

ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तू मिला है तो ये अहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है।
इक ज़रा-सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिसपर
मैंने वो साँस भी तेरे लिए रख छोड़ी है।
तुझ पे हो जाऊँगा क़ुर्बान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

अपना जज़्बात में नग़मात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे।
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने क़िस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे।
प्यार का बन के निगाह-बान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चिराग
जब भी तू आए जगाता हुआ जादू आए।
तुझको छू लूँ तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए।
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा।
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तसव्वुर = Contemplation, Fancy, Idea,Imagination
निगाह-बान = Guard, Janitor, Keeper, Protector
उनवान = Form, Label, Legend, Preface, Title




Qateel Shifai Ghazal – बोल रहा था कल वो मुझसे हाथ में मेरा हाथ लिए

बोल रहा था कल वो मुझसे हाथ में मेरा हाथ लिए
चलते रहेंगे सुख-दुख के हम सारे मौसम साथ लिए।

उसने अपनी झोली से कल प्यार के हमको फूल दिए
लौट आए हैं दामन भर के उसकी ये सौग़ात लिए।

रंग डालो तन मन की बगिया, फ़ागुन बन कर आ जाओ
बरस पड़ो दिल के आँगन में रंगों की बरसात लिए।

हमने अपनी सारी शामें लिख दीं उनके नाम ‘क़तील’
उम्र का लमहा-लमहा बीता उनको अपने साथ लिए।

Ahmed Faraz Ghazal – ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे

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ऐसे चुप है कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे,
तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे।

अपने ही साये से हर गाम लरज़ जाता हूँ,
रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे।

कितने नादाँ हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे।

मंज़िलें दूर भी हैं, मंज़िलें नज़दीक भी हैं,
अपने ही पाँवों में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे।

आज दिल खोल के रोए हैं तो यों खुश हैं ‘फ़राज़’
चंद लमहों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे।

गाम = Step
लरज़ = Shake

Qateel Shifai Ghazal – इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद

इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया।

मेरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए
तेरा वज़ूद है लाज़िम मेरी ग़ज़ल के लिए।

कहाँ से ढूँढ़ के लाऊँ चराग से वो बदन
तरस गई हैं निग़ाहें कँवल-कँवल के लिए।

कि कैसा तजर्बा मुझको हुआ है आज की रात
बचा के धड़कनें रख ली हैं मैंने कल के लिए।


क्या बेमुरौव्वत ख़ल्क़ है सब जमा है बिस्मिल के पास
तनहा मेरा क़ातिल रहा कोई नहीं क़ातिल के पास।

‘क़तील’ ज़ख़्म सहूँ और मुसकुराता रहूँ
बने हैं दायरे क्या-क्या मेरे अमल के लिए।


लाज़िम = Essential, Important, Necessary
ख़ल्क़ = World




Qateel Shifai Ghazal – अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।

बादाह = Wine, Spirits

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