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Category: Qateel Shifai Ghazal Lyrics

Qateel Shifai Ghazal – Wafa Ke Sheesh Mahal Mein Saja Liya Maine

वफ़ा के शीश महल में सजा लिया मैनें
वो एक दिल जिसे पत्थर बना लिया मैनें

ये सोच कर कि न हो ताक में ख़ुशी कोई
ग़मों कि ओट में ख़ुद को छुपा लिया मैनें

कभी न ख़त्म किया मैं ने रोशनी का मुहाज़*
अगर चिराग़ बुझा, दिल जला लिया मैनें

कमाल ये है कि जो दुश्मन पे चलाना था
वो तीर अपने कलेजे पे खा लिया मैनें

“क़तील” जिसकी अदावत में एक प्यार भी था
उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें

*मुहाज़ – लड़ाई, युद्ध

Qateel Shifai Ghazal – Sham Ke Sanwle Chehre Ko Nikhara Jaye

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये

रास आया नहीं तस्कीं* का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये

मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें क़ातिल
तुझको किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाये

मुझको डर है तेरे वादे पे भरोसा करके
मुफ़्त में ये दिल-ए-ख़ुशफ़हम न मारा जाये

जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख़्शाँ* थे “क़तील”
कैसे अब उस के बिना वक़्त गुज़ारा जाये

* तस्कीं – संतुष्टि, शान्ति
* दरख़्शाँ – चमकदार

Qateel Shifai Ghazal – Sadma To Hai Mujhe Bhi Ki Tujhse Juda Hu Main

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं

बिखरा पडा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूंढता हूँ मैं

मैं खुदकशी के जुर्म का करता हूँ ऐतराफ़
अपने बदन की कब्र में कबसे गड़ा हूँ मैं

किस-किसका नाम लाऊँ ज़बान पर की तेरे साथ
हर रोज़ एक शख्स नया देखता हूँ मैं

क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सच मुच तेरा हूँ मैं

पहुँचा जो तेरे दर पे महसूस ये हुआ
लम्बी सी एक कतार मे जैसे खडा हूँ मैं

ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रकीब
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं

जागा हुआ ज़मीर वो आईना है ‘क़तील’
सोने से पहले रोज़ जिसे देखता हूँ मैं


Qateel Shifai Ghazal – Sari Basti Mein Ye Jadu Nazar Aaye Mujhko


सारी बस्ती में ये जादू नज़र आए मुझको
जो दरीचा भी खुले तू नज़र आए मुझको

सदियों का रत जगा मेरी रातों में आ गया
मैं एक हसीन शख्स की बातों में आ गया

जब तस्सवुर मेरा चुपके से तुझे छू आए
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए

गुस्ताख हवाओं की शिकायत न किया कर
उड़ जाए दुपट्टा तो खनक औढ लिया कर

तुम पूछो और में न बताउ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

रात के सन्नाटे में हमने क्या-क्या धोके खाए है
अपना ही जब दिल धड़का तो हम समझे वो आए है

Qateel Shifai Ghazal – Haath Diya Usne Mere Haath Mein

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में
मैं तो वली* बन गया एक रात मे

इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बटती नहीं खैरात में

इश्क़ बुरी शै सही, पर दोस्तो
दख्ल न दो तुम, मेरी हर बात में

हाथ में कागज़ की लिए छतरियाँ
घर से ना निकला करो बरसात में

रत* बढ़ाया उसने न ‘क़तील’ इसलिए
फर्क था दोनों के खयालात में

* वली – मुसलिम साधु, युवराज
* रत – प्रेम प्रसंग

Qateel Shifai Ghazal – Hijr Ki Pehli Sham Ke Saye Dur Ufak Tak Chhaye The

हिज्र* की पहली शाम के साये दूर उफ़क़* तक छाये थे
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे

जाने वो क्या सोच रहा था अपने दिल में सारी रात
प्यार की बातें करते करते उस के नैन भर आये थे

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे

उसने कितने प्यार से अपना कुफ़्र दिया नज़राने में
हम अपने ईमान का सौदा जिससे करने आये थे

कैसे जाती मेरे बदन से बीते लम्हों की ख़ुश्बू
ख़्वाबों की उस बस्ती में कुछ फूल मेरे हम-साये थे

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे

रुख़्सत के दिन भीगी आँखों उसका वो कहना हाए “क़तील”
तुम को लौट ही जाना था तो इस नगरी क्यूँ आये थे

* हिज़्र – जुदाई, बिछोह
* उफ़क़ – क्षितिज


Qateel Shifai Ghazal – ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं


ज़िन्दग़ी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तू मिला है तो ये अहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है।
इक ज़रा-सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिसपर
मैंने वो साँस भी तेरे लिए रख छोड़ी है।
तुझ पे हो जाऊँगा क़ुर्बान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

अपना जज़्बात में नग़मात रचाने के लिए
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे।
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने क़िस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे।
प्यार का बन के निगाह-बान तुझे चाहूँगा
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चिराग
जब भी तू आए जगाता हुआ जादू आए।
तुझको छू लूँ तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आए।
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा।
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।

तसव्वुर = Contemplation, Fancy, Idea,Imagination
निगाह-बान = Guard, Janitor, Keeper, Protector
उनवान = Form, Label, Legend, Preface, Title

Qateel Shifai Ghazal – बोल रहा था कल वो मुझसे हाथ में मेरा हाथ लिए

बोल रहा था कल वो मुझसे हाथ में मेरा हाथ लिए
चलते रहेंगे सुख-दुख के हम सारे मौसम साथ लिए।

उसने अपनी झोली से कल प्यार के हमको फूल दिए
लौट आए हैं दामन भर के उसकी ये सौग़ात लिए।

रंग डालो तन मन की बगिया, फ़ागुन बन कर आ जाओ
बरस पड़ो दिल के आँगन में रंगों की बरसात लिए।

हमने अपनी सारी शामें लिख दीं उनके नाम ‘क़तील’
उम्र का लमहा-लमहा बीता उनको अपने साथ लिए।

Qateel Shifai Ghazal – इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद

इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया।

मेरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए
तेरा वज़ूद है लाज़िम मेरी ग़ज़ल के लिए।

कहाँ से ढूँढ़ के लाऊँ चराग से वो बदन
तरस गई हैं निग़ाहें कँवल-कँवल के लिए।

कि कैसा तजर्बा मुझको हुआ है आज की रात
बचा के धड़कनें रख ली हैं मैंने कल के लिए।


क्या बेमुरौव्वत ख़ल्क़ है सब जमा है बिस्मिल के पास
तनहा मेरा क़ातिल रहा कोई नहीं क़ातिल के पास।

‘क़तील’ ज़ख़्म सहूँ और मुसकुराता रहूँ
बने हैं दायरे क्या-क्या मेरे अमल के लिए।


लाज़िम = Essential, Important, Necessary
ख़ल्क़ = World

Qateel Shifai Ghazal – अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने
ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको।

ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।

बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको।

बादाह = Wine, Spirits

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