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Category: Waseem Barelvi Ghazal Lyrics

Waseem Barelvi Ghazal – Kya Dukh Hai Samundar Ko Bata Bhi Nahi Sakta

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए जिन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूंढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चरागों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

Waseem Barelvi Ghazal – Mili Hawaon Mein Udne Ki Vo Saza Yaroon

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो
के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो

वो बेख़याल मुसाफ़िर, मैं रास्ता यारो
कहाँ था बस में मेरे, उस को रोकना यारो

मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो

तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम था
मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो

Waseem Barelvi Ghazal – Main Aasma Pe Bahut Der Reh Nahi Sakta

मैं आसमां पे बहुत देर रह नहीं सकता
मगर यह बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता

किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूं
सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता

यह आज़माने की फुर्सत तुझे कभी मिल जाये
मैं आंखों -आंखों में क्या बात कह नहीं सकता

सहारा लेना ही पड़ता है मुझको दरिया का
मैं एक कतरा हूँ तनहा तो बह नहीं सकता

लगा के देख ले ,जो भी हिसाब आता हो
मुझे घटा के वह गिनती में रह नहीं सकता

यह चन्द लम्हों की बेइख्तियारियां* हैं ‘वसीम’
गुनाह से रिश्ता बहुत देर रह नहीं सकता

*बेइखितयारियां – काबू न होना


Waseem Barelvi Ghazal – Kuch Is Tarah Veh Meri Zindagi Mein Aaya Tha


कुछ इस तरह वह मेरी जिंदगी में आया था
कि मेरा होते हुए भी, बस एक साया था

हवा में उडने की धुन ने यह दिन दिखाया था
उडान मेरी थी, लेकिन सफर पराया था

यह कौन राह दिखाकर चला गया मुझको
मैं जिंदगी में भला किस के काम आया था

मैं अपने वायदे पे कायम न रह सका वरना
वह थोडी दूर ही जाकर तो लौट आया था

न अब वह घर है , न उस के लोग याद “वसीम”
न जाने उसने कहाँ से मुझे चुराया था

Waseem Barelvi Ghazal – Main Chahta Bhi Yahi Tha Vo Bewafa Nikle

मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी* के पन्ने उलट के देख ज़रा
न जाने कौन-सा पन्ना मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले

Waseem Barelvi Ghazal – Apne Har Ik Lufz Ka Khud Aaina Ho Jaunga

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे, तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो, अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है, मेरी अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?


Waseem Barelvi Ghazal – Vo Mujhe Chhodkar Yun Aage Bada Jata Hai


वो मुझे छोडकर यूँ आगे बढा जाता है
जैसे अब मेरा सफर खत्म हुआ जाता है

बात रोने की लगे और हँसा जाता है
यूँ भी हालात से समझौता किया जाता है

दिल के रिशते ही गिरा देते हैं दीवारें भी
दिल के रिशतों ही को दीवार कहा जाता है

ये मेरी आखरी शब तो नहीं मयखाने में
काँपते हाथों से क्यों ज़ाम दिया जाता है

किस अदालत में सुना जायेगा दावा उनका
जिन उममीदों का गला घोंट दिया जाता है

फासले जिस की रफाकत का मुक़द्दर ठहरे
उस मुसाफिर का कहाँ साथ दिया जाता है

रात आधी से जयादा ही गयी होगी “वसीम”
आओ घर लौट लें, नावकत* हुआ जाता है

*नावकत – देर

Waseem Barelvi Ghazal – Main Apne Khwab Se Bichhda Nazar Nahi Aata

मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रस्ता नज़र नहीं आता

धुआँ भरा है यहाँ तो सभी की आँखों में
किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता

Waseem Barelvi Ghazal – Miri Nazar Ke Salike Mein Kya Nahi Aata

मिरी नज़र के सलीके में क्या नहीं आता
बस इक तिरी ही तरफ़ देखने नहीं आता

अकेले चलना तो मेरा नसीब था कि मुझे
किसी के साथ सफ़र बाँटना नहीं आता

उधर तो जाते हैं रस्ते तमाम होने को
इधर से होके कोई रास्ता नहीं आता

जगाना आता है उसको कई तरीकों से
घरों पे दस्तकें देने खुदा नहीं आता

यहाँ पे तुम ही नहीं आस पास और भी हैं
पर उस तरह से तुम्हें सोचना नहीं आता

पड़े रहो यूँ ही सहमे हुए दियों की तरह
अगर हवाओं के पर बांधना नहीं आता

Waseem Barelvi Ghazal – Tujhko Socha To Pata Ho Gaya Ruswai Ko

तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई को
मैंने महफूज़ समझ रखा था तन्हाई को

जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता है
ख़ाक समझेगा मुसव्विर तेरी अँगडाई को

अपनी दरियाई पे इतरा न बहुत ऐ दरिया
एक कतरा ही बहुत है तेरी रुसवाई को

चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन
झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को

साथ मौजों के सभी हो जहाँ बहने वाले
कौन समझेगा समन्दर तेरी गहराई को

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