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Category: Waseem Barelvi Ghazal Lyrics

Waseem Barelvi Ghazal – Jehan Mein Pani Ke Badal Agar Aaye Hote

ज़हन में पानी के बादल अगर आये होते
मैंने मिटटी के घरोंदे ना बनाये होते

धूप के एक ही मौसम ने जिन्हें तोड़ दिया
इतने नाज़ुक भी ये रिश्ते न बनाये होते

डूबते शहर मैं मिटटी का मकान गिरता ही
तुम ये सब सोच के मेरी तरफ आये होते

धूप के शहर में इक उम्र ना जलना पड़ता
हम भी ए काश किसी पेड के साये होते

फल पडोसी के दरख्तों पे ना पकते तो वसीम
मेरे आँगन में ये पत्थर भी ना आये होते

Waseem Barelvi Ghazal – Raat Ke Tukdo Pe Palna Chhod De

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे
शमा से कहना के जलना छोड़ दे

मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं
कैसे कोई राह चलना छोड़ दे

तुझसे उम्मीदे- वफ़ा बेकार है
कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे

मैं तो ये हिम्मत दिखा पाया नहीं
तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे

कुछ तो कर आदाबे-महफ़िल का लिहाज़
यार ! ये पहलू बदलना छोड़ दे

Waseem Barelvi Ghazal – Husn Bazaar Hua Kya Ki Hunar Khatm Hua

हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ

उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी
कौन कहता है की मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ

नयी कालोनी में बच्चों की ज़िदे ले तो गईं
बाप दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ

जा, हमेशा को मुझे छोड़ के जाने वाले
तुझ से हर लम्हा बिछड़ने का तो डर ख़त्म हुआ


Waseem Barelvi Ghazal – Udaan Walon Udanon Pe Vakt Bhari Hai


उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है
परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है

मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ
मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है

कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को
वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत
ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

Waseem Barelvi Ghazal – Kahi-Suni Pe Bahut Aitbar Karne Lage

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे

पुराने लोगों के दिल भी हैं ख़ुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे

नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे

कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे

हमारी सादामिजाज़ी की दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे

Waseem Barelvi Ghazal – Lahu Na Ho To Kalam Tarjuma Nahi Hota

लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई
के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

‘वसीम’ सदियों की आँखों से देखिये मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता


Waseem Barelvi Ghazal – Sabne Milaya Hath Yahan Tiragi Ke Sath


सबने मिलाया हाथ यहाँ तीरगी* के साथ
कितना बड़ा मज़ाक हुआ रोशनी के साथ

शर्तें लगाईं जाती नहीं दोस्ती के साथ
कीजिये मुझे कुबूल मेरी हर कमी के साथ

तेरा ख़याल, तेरी तलब, तेरी आरज़ू
गुजरी है सारी उम्र किसी रोशनी के साथ

किस काम की रही ये दिखावे की ज़िन्दगी
वादे किए किसी से गुज़ारी किसी के साथ .

दुनीयाँ को बेवफाई का इलज़ाम कौन दे ?
अपनी ही निभ सकी न बहुत दिन किसी के साथ

*तीरगी = अँधेरा ( Darkness)

Waseem Barelvi Ghazal – Meri Aankhon Ko Yeh Sab Kaun Batane Dega

मेरी आँख को यह सब कौन बताने देगा
खवाब जिसके हैं वहीं नींद न आने देगा

उसने यूँ बाँध लिया खुद को नये रिशतों में
जैसे मुझ पर कोई इलज़ाम न आने देगा

सब अंधेरे से कोई वादा किये बैठ हैं
कौन ऐसे में मुझे शमा जलाने देगा

भीगती झील, कमल, बाग महक, सन्नाटा,
यह मेरा गाँव, मुझे शहर न जाने देगा

वह भी आँखों में कई खवाब लिये बैठा है
यह तसव्वुर* ही कभी नींद न आने देगा

कल की बातें न करो, मुझ से कोई अहद न लो
वक़्त बदलेगा तो कुछ याद न आने देगा

अब तो हालात से समझौता ही कर लीजे “वसीम”
कौन माज़ी* की तरफ लौट के जाने देगा

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