Jagjit Singh Ghazal – हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी

1 Comment

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  1. ऐसे तो निदा फाजली साहब की हर गजल मुझे अच्छा लगता है लेकिन उसमें से सबसे अच्छा पसंदीदा मेरा ग़ज़ल जो है वह गजल का नाम है हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी इस गाने को मैं सुनता ही नहीं बल्कि गुनगुनाता हूं और गाता भी हूं

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