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Majrooh Sultanpuri Ghazal – Mujhe Sahal Ho Gai Manzile Vo Hawa Ke Rukh Bhi Badal Gaye

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए

वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी जुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए

वही बात जो न वो कह सके मेरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई,
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे-शराब में ढल गए ।

तुझे चश्मे-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है,
तुझे चश्मे-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगी ने पिघल गए

उन्हें कब के रास भी आ चुके तेरी बज़्मे-नाज़ के हादिसे,
अब उठे कि तेरी नज़र फिरे जो गिरे थे गिर के सम्भल गए

मेरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें,
बढ़ी इस क़दर मेरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए ।

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