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Mirza Ghalib Ghazal – Arj-a-Niyaaz-a-Ishq Ke Kabil Nahi Raha

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिये हुए
हूँ शम्मा-ए-कुश्ता दरख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा

मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं
शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिल नहीं रहा

ब-रू-ए-शश जिहत दर-ए-आईनाबाज़ है
याँ इम्तिआज़-ए-नाकिस-ओ-क़ामिल नहीं रहा

वा कर दिये हैं शौक़ ने बन्द-ए-नक़ाब-ए-हुस्न
ग़ैर अज़ निगाह अब कोई हाइल नहीं रहा

गो मैं रहा रहीन-ए-सितम हाये रोज़गार
लेकिन तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा

दिल से हवा-ए-किश्त-ए-वफ़ा मिट के वाँ
हासिल सिवाये हस्रत-ए-हासिल नहीं रहा

बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरते मगर ‘असद’
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा


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