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Munawwar Rana Ghazal – Almari Se Khat Uske Purane Nikal Aaye

अलमारी से ख़त उसके पुराने निकल आए
फिर से मेरे चेहरे पे ये दाने निकल आए

माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मेरा रस्ता
मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए

मुमकिनहै हमें गाँव भी पहचान न पाए
बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए

बोसीदा* किताबों के वरक़* जैसे हैं हम लोग
जब हुक्म दिया हमको कमाने निकल आए

ऐ रेत के ज़र्रे* तेरा एहसान बहुत है
आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए

अब तेरे बुलाने से भी आ नहीं सकतेl
हम तुझसे बहुत आगे ज़माने निकल आए

एक ख़ौफ़-सा रहता है मेरे दिल में हमेशा
किस घर से तेरी याद न जाने निकल आए

* बोसीदा – पुरानी
* वरक़ – पन्ने
* ज़र्रे – कण


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