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Munawwar Rana Ghazal – Daaman Ko Aanshuon Se Sharabor Kar Diya

दामन को आँसुओं से शराबोर कर दिया
उसने मेरे इरादे को कमज़ोर कर दिया

बारिश हुई तो झूम के सब नाचने लगे
मौसम ने पेड़-पौधों को भी मोर कर दिया

मैं वो दिया हूँ जिससे लरज़ती* है अब हवा
आँधी ने छेड़-छेड़ के मुँहज़ोर कर दिया

इज़हार-ए-इश्क़ ग़ैर-ज़रूरी था , आपने
तशरीह* कर के शेर को कमज़ोर कर दिया

उसके हसब-नसब* पे कोई शक़ नहीं मगर
उसको मुशायरों ने ग़ज़ल-चोर कर दिया

उसने भी मुझको क़िस्से की सूरत भुला दिया
मैंने भी आरज़ूओं को दरगोर कर दिया

लरज़ना = कांपना, लड़खड़ाना
तशरीह = व्याख्या
हसब-नसब = वंश, आनुवंशिकता

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