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Munawwar Rana Ghazal – Jagmagate Hue Shehro Ko Tabahi Dega

जगमगाते हुए शहरों को तबाही देगा
और क्या मुल्क को मग़रूर* सिपाही देगा

पेड़ उम्मीदों का ये सोच के न काटा कभी
फल न आ पाएँगे इसमें तो हवा ही देगा

तुमने ख़ुद ज़ुल्म को मेयारे-हुक़ुमत* समझा
अब भला कौन तुम्हें मसनदे-शाही* देगा

जिसमें सदियों से ग़रीबों का लहू जलता हो
वो दीया रौशनी क्या देगा सियाही देगा

मुंसिफ़े-वक़्त* है तू और मैं मज़लूम* मगर
तेरा क़ानून मुझे फिर भी सज़ा ही देगा

किस में हिम्मत है जो सच बात कहेगा ‘राना’
कौन है अब जो मेरे हक़ में गवाही देगा

* मग़रूर – घमण्डी,दम्भी
* मेयारे-हुक़ुमत – प्रशासन का मानदण्ड
* मसनदे-शाही – राजसी प्रतिष्ठा
* मुंसिफ़े-वक़्त – समय के न्यायकर्त्ता
* मज़लूम – प्रताड़ित

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