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Munawwar Rana Ghazal – Kirdar Par Gunah Ki Kalikh Laga Ke Hum

किरदार पर गुनाह की कालिख लगा के हम
दुनिया से जा रहे है यह दौलत कमा के हम

जितनी तव्क्कुआत जमाने को हम से है
उतनी तो उम्र भी नहीं लाए लिखा के हम

क्या जाने कब उतार पे आ जाए ये पतंग
अब तक तो उड़ रहे है सहारे हवा के हम

फिर आसुओ ने हमको निशाने पे रख लिया
एक बार हस दिए थे कभी खिलखिला के हम

कुछ और बढ़ गया है अँधेरा पड़ोस का
शर्मिंदा हो रहे है दिये को जला के हम

हम कोहकन मिजाजो से आगे की चीज़ है
ढूंढेगे मोतियों को समुन्दर सुखा के हम


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