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Munawwar Rana Ghazal – Main Khul Ke Hans To Raha Hun Fakir Hote Hue

मैं खुल के हँस तो रहा हूँ फ़क़ीर होते हुए
वो मुस्कुरा भी न पाया अमीर होते हुए

यहाँ पे इज़्ज़तें मरने के बाद मिलती हैं
मैं सीढ़ियों पे पड़ा हूँ कबीर होते हुए

अजीब खेल है दुनिया तेरी सियासत का
मैं पैदलों से पिटा हूँ वज़ीर होते हुए

ये एहतेज़ाज़* की धुन का ख़याल रखते हैं
परिंदे चुप नहीं रहते असीर* होते हुए

नये तरीक़े से मैंने ये जंग जीती है
कमान फेंक दी तरकश में तीर होते हुए

जिसे भी चाहिए मुझसे दुआएँ ले जाए
लुटा रहा हूँ मैं दौलत फ़क़ीर होते हुए

तमाम चाहने वालों को भूल जाते हैं
बहुत से लोग तरक़्क़ी-पज़ीर* होते हुए

* एहतेज़ाज़ – आनंद
* असीर – बंदी
* तरक़्क़ी-पज़ीर – प्रगतिशील

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