Munawwar Rana Ghazal – Meri Chahat Ka Fakiri Se Sira Milta Hai

मेरी चाहत का फ़क़ीरी से सिरा मिलता है
कोई नंबर भी मिलाता हूँ तेरा मिलता है

तुम इन आँखों के बरसने से परेशाँ क्यों हो
ऐसे मौसम में तो हर पेड़ हरा मिलता है
एक दीया गाँव में हर रोज़ बुझाती है हवा
रोज़ फुटपाथ पर एक शख़्स मरा मिलता है

ऐ मुहब्बत तुझे किस ख़ाने में रक्खा जाए
शहर का शहर तो नफ़रत से भरा मिलता है

आपसे मिलके ये अहसास है बाक़ी कि अभी
इस सियासत में भी इंसान खरा मिलता है

ये सियासत है तो फिर मुझको इजाज़त दी जाए
जो भी मिलता है यहाँ ख़्वाजा-सरा* मिलता है

* ख़्वाजा-सरा – हिजड़ा

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