Munawwar Rana Ghazal – Muskurahat Mere Jakhmo Ko Chhupa Leti Hai

मुस्कुराहट मेरे ज़ख्मों को छुपा लेती है
ये वो चादर है जो ऐबों को छुपा लेती है

मैं भी हँसते हुए लोगों से नहीं मिलता हूँ
वो भी रोती है तो आँखों को छुपा लेती है

इस तरह मैने तेरा राज़ छुपाया था सब से
जिस तरह घास जमीनो को छुपा लेती है

अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म कि राना
माँ की ममता मुझे बाँहों मे छुपा लेती है

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