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Munawwar Rana Ghazal – Umar Bhar Khali Yun Hi Dil Ka Makan Rehne Diya

उम्र भर ख़ाली यूँ हि दिल का मकाँ रहने दिया
तुम गये तो दूसरे को कब यहाँ रहने दिया

उम्र भर उसने भी मुझ से मेरा दुख पूछा नहीं
मैंने भी ख्वाहिश को अपनी बेज़बाँ रहने दिया

उसने जब भी सौँप दी है जिस्म कि उजली किताब
मैंने कुछ औराक़ उलटे कुछ को, हाँ रहने दिया

मैंने कल शब चाहतों कि सब क़िताबें फ़ाड़ दीं
सिर्फ इक कागज़ पे लिक्खा लफ़्ज़े-माँ रहने दिया

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