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Munawwar Rana Ghazal – Umeed Bhi Kirdar Pe Puri Nahi Utari

उम्मीद भी किरदार पे पूरी नहीं उतरी
ये शब* दिले-बीमार पे पूरी नहीं उतरी

क्या ख़ौफ़ का मंज़र था तेरे शहर में कल रात
सच्चाई भी अख़बार में पूरी नहीं उतरी

तस्वीर में एक रंग अभी छूट रहा है
शोख़ी अभी रुख़सार* पे पूरी नहीं उतरी

पर उसके कहीं,जिस्म कहीं, ख़ुद वो कहीं है
चिड़िया कभी मीनार पे पूरी नहीं उतरी

एक तेरे न रहने से बदल जाता है सब कुछ
कल धूप भी दीवार पे पूरी नहीं उतरी

मैं दुनिया के मेयार पे पूरा नहीं उतरा
दुनिया मेरे मेयार पे पूरी नहीं उतरी

* शब – रात
* रुख़सार – चेहरा



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