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Qateel Shifai Ghazal – Kya Jane Kis Khumar Mein Kis Josh Mein Gira

क्या जाने किस खुमार में किस जोश में गिरा
वो फल शज़र से जो मेरे आगोश में गिरा

कुछ दाएरे से बन गए सतह-ए-ख्याल पर
जब कोई फूल सागर-ए-मय-नोश* में गिरा

बाकी रही न फिर वो सुनहरी लकीर भी
तारा जो टूट कर शब-ए-खामोश* में गिरा

उड़ता रहा तो चाँद से यारा न था मेरा
घाइल हुआ तो वादी-ए-गुल-पोश* में गिरा

बे-आबरू न थी कोई लग्जिश* मेरी क़तील
मैं जब गिरा जहाँ भी गिरा होश में गिरा

* सागर-ए-मय-नोश – शराब पीने का गिलास
* शब-ए-खामोश – रात की खामोशी
* वादी-ए-गुल-पोश – फूलों की घाटी
* लग्जिश – भूल, गलती

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