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Qateel Shifai Ghazal – Sadma To Hai Mujhe Bhi Ki Tujhse Juda Hu Main

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं
लेकिन ये सोचता हूँ कि अब तेरा क्या हूँ मैं

बिखरा पडा है तेरे ही घर में तेरा वजूद
बेकार महफिलों में तुझे ढूंढता हूँ मैं

मैं खुदकशी के जुर्म का करता हूँ ऐतराफ़
अपने बदन की कब्र में कबसे गड़ा हूँ मैं

किस-किसका नाम लाऊँ ज़बान पर की तेरे साथ
हर रोज़ एक शख्स नया देखता हूँ मैं

क्या जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है के सच मुच तेरा हूँ मैं

पहुँचा जो तेरे दर पे महसूस ये हुआ
लम्बी सी एक कतार मे जैसे खडा हूँ मैं

ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रकीब
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं

जागा हुआ ज़मीर वो आईना है ‘क़तील’
सोने से पहले रोज़ जिसे देखता हूँ मैं

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