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Qateel Shifai Ghazal – Sham Ke Sanwle Chehre Ko Nikhara Jaye

शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये

रास आया नहीं तस्कीं* का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये

मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें क़ातिल
तुझको किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाये

मुझको डर है तेरे वादे पे भरोसा करके
मुफ़्त में ये दिल-ए-ख़ुशफ़हम न मारा जाये

जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख़्शाँ* थे “क़तील”
कैसे अब उस के बिना वक़्त गुज़ारा जाये

* तस्कीं – संतुष्टि, शान्ति
* दरख़्शाँ – चमकदार

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