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Rahat Indori Ghazal – Masjido Ke Sahan Tak Jana Bahut Dushvar Tha

मस्जिदों के सहन तक जाना बहुत दुश्वार था
देर से निकला तो मेरे रास्ते में दार था

अपने ही फैलाओ के नशे में खोया था दरख़्त
और हर मासूम टहनी पर फलों का भार था

देखते ही देखते शहरों की रौनक़ बन गया
कल यही चेहरा था जो हर आईने पे भार था

सब के दुख सुख़ उस के चेहरे पे लिखे पाये गये
आदमी क्या था हमारे शहर का अख़बार था

अब मोहल्ले भर के दरवाज़ों पे दस्तक है नसीब
एक ज़माना था कि जब मैं भी बहुत ख़ुद्दार था

काग़ज़ों की सब सियाही बारिशों में धुल गई
हम ने जो सोचा तेरे बारे में सब बेकार था

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