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Sahir Ludhianvi Ghazal – Mere Khwabon Ke Jharokon Ko Sajane Wali

मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली

तेरे ख्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं

पूछकर अपनी निगाहों से बतादे मुझको

मेरी रातों की मुक़द्दर में सहर है कि नहीं

चार दिन की ये रफ़ाक़त जो रफ़ाक़त भी नहीं

उमर् भर के लिए आज़ार हुई जाती है

जिन्दगी यूं तो हमेशा से परेशान सी थी

अब तो हर सांस गिरांबार हुई जाती है

मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में

तू किसी ख्वाब के पैकर की तरह आई है

कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आती है

कभी इख़लास की मूरत कभी हरजाई है

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी

तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं

तूने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें

उन तमन्नाओ का इज़हार करूं या न करूं

तू किसी और के दामन की कली है लेकिन

मेरी रातें तेरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं

तू कहीं भी हो तेरे फूल से आरिज़ की क़सम

तेरी पलकें मेरी आंखों पे झुकी रहती हैं

तेरे हाथों की हरारत तेरे सांसों की महक

तैरती रहती है एहसास की पहनाई में

ढूंढती रहती हैं तख़ईल की बाहें तुझको

सर्द रातों की सुलगती हुई तनहाई में

तेरा अल्ताफ़-ओ-करम एक हक़ीक़त है मगर

ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो

तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम

दिल के ख़ूं का एक और बहाना ही न हो

कौन जाने मेरी इम्रोज़ का फ़र्दा क्या है

क़ुबर्तें बढ़ के पशेमान भी हो जाती है

दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें

देखते देखते अंजान भी हो जाती है

मेरी दरमांदा जवानी की तमाओं के

मुज्महिल ख्वाब की ताबीर बता दे मुझको

तेरे दामन में गुलिस्ता भी है, वीराने भी

मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझको


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