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Tag: ghazals by Munawwar Rana

Munawwar Rana Ghazal – Sehra Pasand Ho Ke Simatne Laga Hu Main

सहरा-पसंद हो के सिमटने लगा हूँ मैं
अँदर से लग रहा हूँ कि बँटने लगा हूँ मैं

क्या फिर किसी सफ़र पे निकलना है अब मुझे
दीवारो-दर से क्यों ये लिपटने लगा हूँ मैं

आते हैं जैसे- जैसे बिछड़ने के दिन करीब
लगता है जैसे रेल से कटने लगा हूँ मैं

क्या मुझमें एहतेजाज की ताक़त नहीं रही
पीछे की सिम्त किस लिए हटने लगा हूँ मैं

फिर सारी उम्र चाँद ने रक्खा मेरा ख़याल
एक रोज़ कह दिया था कि घटने लगा हूँ मैं

उसने भी ऐतबार की चादर समेट ली
शायद ज़बान दे के पलटने लगा हूँ मैं

Munawwar Rana Ghazal – Badi Kadwahate Hai Isliye Aisa Nahi Hota

बड़ी कड़वाहटे हैं इसलिए ऐसा नहीं होता
शकर खाता चला जाता हूँ मुहँ मीठा नहीं होता

दवा की तरह खाते जाइये गाली बुजुर्गों की
जो अच्छे फल हैं उनका ज़ायका अच्छा नहीं होता

हमारे शहर में ऐसे मनाज़िर* रोज़ मिलते हैं
कि सब होता है चेहरे पर मगर चेहरा नहीं होता

हमारी बेरुखी की देन है बाज़ार की ज़ीनत*
अगर हम में वफा होती तो यह कोठा नहीं होता

* मनाज़िर – नज़ारे
* जीनत – शोभा

Munawwar Rana Ghazal – Kisi Ke Jakhm Par Chahat Se Patti Kaun Bandhega

किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बान्धेगा
अग़र बहने नही होगी तो राखी कौन बान्धेगा

जहा लडकी कि इज्ज़त लुटना एक खेल बन जाए
वहा पर ऐ कबुतर तेरे चिट्ठी कौन बान्धेगा

ये बाजारे सियासत है यहाँ खुद्दारिया कैसी
सभी के हाथ मे कांसा* है मुट्ठी कोन बान्धेगा

तुम्हारी महफ़िलो मे हम बडे बुढे जरूरी है
अग़र हम हि नही होंगे तो पगडी कौन बान्धेगा

मुकद्दर देखीए वो बाँझ भी है और बुढी भी
हमेशा सोचती रहती है गठरी कौन बांधेगा

* कांसा – भिक्षा पात्र


Munawwar Rana Ghazal – Main Hun Agar Chirag To Jal Jana Chahiye


मैं हूं अग़र चराग़ तो जल जाना चाहिये
मैं पेड़ हूं तो पेड़ को फ़ल जाना चाहिये

रिश्तों को क्यूं उठाये कोई बोझ की तरह
अब उसकी जिन्दगी से निकल जाना चाहिये

जब दोस्ती भी फ़ूंक के रखने लगे कदम
फ़िर दुश्मनी तुझे भी संभल जाना चाहिये

मेहमान अपनी मर्जी से जाते नहीं कभी
तुम को मेरे ख्याल से कल जाना चाहिये

इस घर को अब हमारी जरूरत नहीं रही
अब आफ़ताबे-उम्र को ढ़ल जाना चाहिये

Munawwar Rana Ghazal – Kirdar Par Gunah Ki Kalikh Laga Ke Hum

किरदार पर गुनाह की कालिख लगा के हम
दुनिया से जा रहे है यह दौलत कमा के हम

जितनी तव्क्कुआत जमाने को हम से है
उतनी तो उम्र भी नहीं लाए लिखा के हम

क्या जाने कब उतार पे आ जाए ये पतंग
अब तक तो उड़ रहे है सहारे हवा के हम

फिर आसुओ ने हमको निशाने पे रख लिया
एक बार हस दिए थे कभी खिलखिला के हम

कुछ और बढ़ गया है अँधेरा पड़ोस का
शर्मिंदा हो रहे है दिये को जला के हम

हम कोहकन मिजाजो से आगे की चीज़ है
ढूंढेगे मोतियों को समुन्दर सुखा के हम

Munawwar Rana Ghazal – Is Ped Mein Ik Bar To Aa Jaye Samar Bhi

इस पेड़ में इक बार तो आ जाए समर भी
जो आग इधर है कभी लग जाए उधर भी

कुछ मेरी अना भी मुझे झुकने नहीं देती
कुछ इसकी इजाज़त नहीं देती है कमर भी

पहले मुझे बाज़ार में मिल जाती थी अकसर
रुसवाई ने अब देख लिया है मेरा घर भी

इस वास्ते जी भर के उसे देख न पाए
सुनते हैं कि लग जाती है अपनों की नज़र भी

कुछ उसकी तवज्जो भी नहीम होता है मुझपर
इस खेल से कुछ लगने लगा है मुझे डर भी

उस शहर में जीने की सज़ा काट रहा हूँ
महफ़ूज़ नहीं है जहाँ अल्लाह का घर भी


Munawwar Rana Ghazal – Ae Andhere Dekh Le Muh Tera Kala Ho Gaya

ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

राई के दाने बराबर भी न था जिसका वजूद
नफ़रतों के बीच रह कर वह हिमाला हो गया

एक आँगन की तरह यह शहर था कल तक मगर
नफ़रतों से टूटकर मोती की माला हो गया

शहर को जंगल बना देने में जो मशहूर था
आजकल सुनते हैं वो अल्लाह वाला हो गया

हम ग़रीबों में चले आए बहुत अच्छा किया
आज थोड़ी देर को घर में उजाला हो गया

Munawwar Rana Ghazal – Aankhon Ko Intezar Ki Bhatti Pe Rakh Diya

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया
मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया

आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी
सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया

फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी
मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया

दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया

अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते
जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया

घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को
बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया

पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर
क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

Munawwar Rana Ghazal – Mukhtsar Hote Hue Bhi Zindagi Bad Jayegi

मुख़्तसर* होते हुए भी ज़िन्दगी बढ़ जायेगी
माँ की ऑंखें चूम लीजै रौशनी बढ़ जायेगी

मौत का आना तो तय है मौत आयेगी मगर
आपके आने से थोड़ी ज़िन्दगी बढ़ जायेगी

इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप
शहर वालों से हमारी दुशमनी बढ़ जायेगी

आपके हँसने से खतरा और भी बढ़ जायेगा
इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जायेगी

बेवफ़ाई खेल है इसको नज़र अंदाज़ कर
तज़किरा करने से तो शरमिन्दगी बढ़ जायेगी

* मुख़्तसर = छोटी
* तज़किरा = चर्चा

Munawwar Rana Ghazal – Daaman Ko Aanshuon Se Sharabor Kar Diya

दामन को आँसुओं से शराबोर कर दिया
उसने मेरे इरादे को कमज़ोर कर दिया

बारिश हुई तो झूम के सब नाचने लगे
मौसम ने पेड़-पौधों को भी मोर कर दिया

मैं वो दिया हूँ जिससे लरज़ती* है अब हवा
आँधी ने छेड़-छेड़ के मुँहज़ोर कर दिया

इज़हार-ए-इश्क़ ग़ैर-ज़रूरी था , आपने
तशरीह* कर के शेर को कमज़ोर कर दिया

उसके हसब-नसब* पे कोई शक़ नहीं मगर
उसको मुशायरों ने ग़ज़ल-चोर कर दिया

उसने भी मुझको क़िस्से की सूरत भुला दिया
मैंने भी आरज़ूओं को दरगोर कर दिया

लरज़ना = कांपना, लड़खड़ाना
तशरीह = व्याख्या
हसब-नसब = वंश, आनुवंशिकता

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