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Tag: Waseem Barelvi ki ghazalein

Waseem Barelvi Ghazal – Tumhari Raah Mein Mitti Ke Ghar Nahi Aate

तुम्हारी राह में मिटटी के घर नहीं आते
इसीलिए तुम्हे हम नज़र नहीं आते

मोहब्बतो के दिनों की यही खराबी है
ये रूठ जाएँ तो लौट कर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहजीब-ए-गम समझाने का
उन्ही के रोने में आंसू नज़र नहीं आते

खुशी की आँख में आंसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछ कर नहीं आते

Waseem Barelvi Ghazal – Apne Saye Ko Itna Samjha De Mujhe Mere Hisse Ki Dhoop Aane De

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अपने साये को इतना समझा दे
मुझे मेरे हिस्से की धूप आने दे

एक् नज़र में कई ज़माने देखे तू
बूढ़ी आंखो की तस्वीर बनाने दे

बाबा दुनिया जीत के मैं दिखा दूँगा
अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे

मैं भी तो इस बाग़ का एक् परिंदा हूं
मेरी ही आवाज़ मैं मुझ को गाने दे

फिर तो ये उँचा ही होता जायेगा
बचपन के हाथो में चाँद आ जाने दे

Waseem Barelvi Ghazal – Kaun Si Baat Kahan Kaise Kahi Jati Hai

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ बाप के होंठों से हंसी जाती है

कतरा अब एह्तिजाज़ करे भी तो क्या मिले
दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले

हर शख्स दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ
फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

इस दौर-ए-मुन्साफी में जरुरी नहीं वसीम
जिस शख्स की खता हो उसी को सजा मिले

Waseem Barelvi Ghazal – Usoolon Pe Jahan Aanch Aaye Takrana Jaruri Hai

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त’अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi Ghazal – Main Is Umeed Mein Duba Ki Tu Bacha Lega

मैं इस उम्मीद में डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता “वसीम”
मैं जानता हूँ वह जब चाहेगा बुला लेगा


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Waseem Barelvi Ghazal – Apne Chehre Se Jo Jo Zahir Hai Chhupayen Kaise

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो की इस घर को बचाएं कैसे

क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है
हंसने वाले तुझे आंसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक कतरे को समंदर नज़र आयें कैसे

Waseem Barelvi Ghazal – Aate Aate Mera Naam Sa Reh Gaya

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आते-आते मेरा नाम सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता रह गया

Waseem Barelvi Ghazal – Kahan Tak Aankh Royegi Kahan Tak Kiska Gam Hoga

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कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता
ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता
कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा

Waseem Barelvi Ghazal – Khul Ke Milne Ka Salika Aapko Aata Nahi

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खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अन्दाज़ा नहीं

जा, दिखा दुनिया को, मुझको क्या दिखाता है ग़रूर
तू समन्दर है, तो हो, मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथों में मेरा घर तो है, दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्जे के हों
और अब ऐसा किया मैंने, तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी, जिनके चराग़
मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हक़ीक़त खुल गयी
अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं

Waseem Barelvi Ghazal – Kya Batau Kaise Khud Ko Dar-B-Dar Maine Kiya

क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा इतनी शिद्दत के साथ
जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया

कैसे बच्चों को बताऊं रास्तों के पेचो-ख़म*
ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया

शोहरतों की नज़्र* कर दी शेर की मासूमियत
इस दिये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया

चंद जज़्बातों से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘
कैसा-कैसा जब्र* अपने आप पर मैंने किया

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